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गुरुवार, 19 सितंबर 2024

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क्लाइमेट चेंज के लिए क्लोरो-फ्लोरो कॉर्बन, ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जिम्मेदार है। 'नेट जीरो' जिसे कॉर्बन न्यूट्रैलिटी भी कहा जाता है, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई देश ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बिल्कुल ही न करे यानी एकदम जीरो कर दे। इसका मतलब यह है कि कोई देश वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का जितना उत्सर्जन कर रहा है, उतना ही उसे सोख और हटा भी रहा है यानी वातावरण में वह देश ग्रीन हाउस गैसों को न बढ़ा रहा हो। उदाहरण के तौर पर जंगलों और ग्रीन कवर को बढ़ाकर इन गैसों को सोखा जा सकता है और फ्यूचरिस्टिक टेक्नॉलजीज के जरिए इन गैसों को वातावरण से हटाया जा सकता है। इलेक्ट्रिक वीइकल, ग्रीन फ्यूल के इस्तेमाल, सोलर एनर्जी, इको-फ्रेंडली टेक्नॉलजीज के जरिए ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम किया जा सकता है। इस तरह यह भी संभव है कि किसी देश का उत्सर्जन जीरो से कम हो यानी वह जितना ग्रीन हाउस गैस वातावरण में छोड़ रहा है, उससे ज्यादा वह सोख और हटा रहा है। दुनिया में भूटान और सूरीनाम दो ऐसे देश हैं जिन्होंने 'नेट जीरो'उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल कर लिया है। भूटान को तो अक्सर कॉर्बन-नेगेटिव देश कहा जाता है क्योंकि वह ग्रीनहाउस गैसों का जितना उत्सर्जन करता है, उससे ज्यादा को वह सोख लेता है।'नेट जीरो' उत्सर्जन के लिए लक्ष्य और भारत अबतक 132 देशों ने 2050 से पहले तक 'नेट जीरो' उत्सर्जन तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। कुल वैश्विक उत्सर्जन में करीब 30 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले चीन ने भी इसके लिए 2060 का लक्ष्य रखा है, हालांकि अभी उसका रोडमैप ही स्पष्ट नहीं है। दूसरी तरफ तमाम दबावों को दरकिनार कर भारत नेट जीरो उत्सर्जन के लिए किसी भी तरह के कमिटमेंट से इनकार कर रहा है,पर्यावरण सुरक्षा में भारत दुनिया के लिए पेश कर रहा नजीर कई अध्ययन बताते हैं कि जी-20 देशों में भारत इकलौता ऐसा देश है जो तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के पेरिस अग्रीमेंट के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी कदम उठा रहा है। यहां तक कि अमेरिका और यूरोपीय देशों के ऐक्शन 'अपर्याप्त' हैं। साफ है कि भारत क्लाइमेट चेंज के मोर्चे पर तमाम दूसरे देशों के मुकाबले पहले से ही ज्यादा कर रहा है। अमेरिका और चीन के बाद भारत ग्रीन हाउस गैसों का दुनिया का तीसरा बड़ा उत्सर्जक देश है। लेकिन पर्यावरण सुरक्षा की मुहिम में भारत नेतृत्व की भूमिका निभा रहा है। ग्रीन एनर्जी के लिए इंटरनैशनल सोलर अलायंस जैसी पहल हो या देश के सबसे बड़े एम्प्लॉयर भारतीय रेलवे को 2030 तक नेट-जीरो उत्सर्जक बनाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य, ये भारत की गंभीरता को बताते हैं।

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