बुधवार, 29 दिसंबर 2021

What is "Net Zero By 2050" Policy IEA


अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency’s- IEA) द्वारा शुद्ध शून्य उत्सर्जन (Net Zero Emissions - NZE) हेतु 'नेट ज़ीरो बाय 2050' (Net Zero by 2050) नाम से अपना रोडमैप जारी किया गया है।

यह विश्व का पहला व्यापक ऊर्जा रोडमैप है जिसे नवंबर 2021 में जलवायु परिवर्तन पर स्कॉटलैंड के ग्लासगो में संपन्न होने वाले संयुक्त राष्ट्र के कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ कोप-26 सम्मेलन में अपनाया जाएगा।

‘शुद्ध शून्य उत्सर्जन' का तात्पर्य उत्पादित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और वातावरण से निकाले गए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के मध्य एक समग्र संतुलन स्थापित करना है।

 आवश्यकता:

यदि अभी भी देशों द्वारा जलवायु संबंधी  प्रतिबद्धताओं जिसमें वर्ष 2050 तक कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन को ‘शुद्ध शून्य उत्सर्जन' तक लाना तथा वैश्विक तापन को 1.5 °C तक सीमित करना शामिल है को पूरी तरह से हासिल कर लिया जाए तो उसके बाद भी वे वैश्विक ऊर्जा लक्ष्य को प्राप्त करने से काफी पीछे होगी ।

क्लाइमेट चेंज के लिए क्लोरो-फ्लोरो कॉर्बन, ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जिम्मेदार है। 'नेट जीरो' जिसे कॉर्बन न्यूट्रैलिटी भी कहा जाता है, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई देश ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बिल्कुल ही न करे यानी एकदम जीरो कर दे। इसका मतलब यह है कि कोई देश वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का जितना उत्सर्जन कर रहा है, उतना ही उसे सोख और हटा भी रहा है यानी वातावरण में वह देश ग्रीन हाउस गैसों को न बढ़ा रहा हो। उदाहरण के तौर पर जंगलों और ग्रीन कवर को बढ़ाकर इन गैसों को सोखा जा सकता है और फ्यूचरिस्टिक टेक्नॉलजीज के जरिए इन गैसों को वातावरण से हटाया जा सकता है। इलेक्ट्रिक वीइकल, ग्रीन फ्यूल के इस्तेमाल, सोलर एनर्जी, इको-फ्रेंडली टेक्नॉलजीज के जरिए ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम किया जा सकता है। इस तरह यह भी संभव है कि किसी देश का उत्सर्जन जीरो से कम हो यानी वह जितना ग्रीन हाउस गैस वातावरण में छोड़ रहा है, उससे ज्यादा वह सोख और हटा रहा है। दुनिया में भूटान और सूरीनाम दो ऐसे देश हैं जिन्होंने 'नेट जीरो' उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल कर लिया है। भूटान को तो अक्सर कॉर्बन-नेगेटिव देश कहा जाता है क्योंकि वह ग्रीनहाउस गैसों का जितना उत्सर्जन करता है, उससे ज्यादा को वह सोख लेता है।


'नेट जीरो' उत्सर्जन के लिए लक्ष्य और भारत

अबतक 132 देशों ने 2050 से पहले तक 'नेट जीरो' उत्सर्जन तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। कुल वैश्विक उत्सर्जन में करीब 30 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले चीन ने भी इसके लिए 2060 का लक्ष्य रखा है, हालांकि अभी उसका रोडमैप ही स्पष्ट नहीं है। दूसरी तरफ तमाम दबावों को दरकिनार कर भारत नेट जीरो उत्सर्जन के लिए किसी भी तरह के कमिटमेंट से इनकार कर रहा है।

पर्यावरण सुरक्षा में भारत दुनिया के लिए पेश कर रहा नजीर

कई अध्ययन बताते हैं कि जी-20 देशों में भारत इकलौता ऐसा देश है जो तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के पेरिस अग्रीमेंट के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी कदम उठा रहा है। यहां तक कि अमेरिका और यूरोपीय देशों के ऐक्शन 'अपर्याप्त' हैं। साफ है कि भारत क्लाइमेट चेंज के मोर्चे पर तमाम दूसरे देशों के मुकाबले पहले से ही ज्यादा कर रहा है। अमेरिका और चीन के बाद भारत ग्रीन हाउस गैसों का दुनिया का तीसरा बड़ा उत्सर्जक देश है। लेकिन पर्यावरण सुरक्षा की मुहिम में भारत नेतृत्व की भूमिका निभा रहा है। ग्रीन एनर्जी के लिए इंटरनैशनल सोलर अलायंस जैसी पहल हो या देश के सबसे बड़े एम्प्लॉयर भारतीय रेलवे और दो पहिया और चार पहिया वाहनों (e lectaric)को 2030 तक नेट-जीरो उत्सर्जक बनाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य, ये भारत की गंभीरता को बताते हैं।


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